शिक्षा की प्रवृत्तियाँ

शिक्षा की प्रवृत्तियाँ

किसी भी अनुशासन के दार्शनिक आदर्शो, विषयवस्तु क्रिया पद्धति के द्वारा उसकी प्रवृत्तियों का निर्माण होता है । सामान्यतया व्यवहारों के आधार पर प्रवृत्तियों का आकलन किया जाता है । अर्थात् विषय के अध्यन-अध्यापन, उद्देश्यों और मूल्यों का समाहार उसकी प्रवृत्तियों में होता है । शिक्षा शास्त्र एक अनुशासन है जो व्यापक, विविधतापूर्ण जटिल एवं परिवर्तनशील संकल्पना है । अत: इसकी प्रवृत्तियों में कालगत विकासमान परिवर्तन दिखायी देता है । अर्थात जिस प्रकार समाज की प्रवृत्तियों में परिवर्तन होता है उसी प्रकार शिक्षा की प्रवृतियाँ भी परिवर्तित होती जाती है ।

शिक्षाशास्त्र के उद्गम की प्रारंभिक अवस्था में इस विषय की प्रवृत्ति दार्शनिक और आध्यात्मिक थी । क्योंकि इसका आधार आस्था, विश्वास और परम्परायें थी । इसलिए इसके उद्देश्यों पाठ्यचर्या, क्रियाविधि और मूल्यों में दार्शनिकता व अध्यात्मिकता वर्तमान होती थी । परन्तु समाज ने उद्देश्यों और मूल्यों में परिवर्तन के साथ साथ 19 वीं सदी में शिक्षा की केन्द्रीय प्रवृत्ति मनोवैज्ञानिक वैज्ञानिक सामाजिक फिर समाहारिक होती गई । विकास के इन भिन्न चरणों में शिक्षा के उद्देश्यों पाठ्यचर्या, शिक्षण विधियों और मूल्यों तथा निहितार्थों में परिवर्तन आया है । परिवर्तन के इसी क्रम को पहचानने और तत्कालिक आवश्यकताओं को लक्षित करने के लिए शिक्षा की प्रवृत्तियों में निरन्तर अनुसंधान होते रहते है । समय-समय पर शिक्षा शास्त्री इसे नवीन दिशा देकर इसके कलेवर को आधुनिकता देते हुए विकसित करते रहते है । वर्तमान में शिक्षा की नवीन प्रवृत्तियों का अध्ययन हो, विभिन्न शिक्षा शास्त्रियो द्वारा निम्न प्रकार से किया गया है ।।

1. शिक्षा की मनोवैज्ञानिक प्रवृति 2. शिक्षा की वैज्ञानिक प्रवृत्ति 3. शिक्षा की समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति
4. शिक्षा की समाहारक प्रवृत्ति

शिक्षा की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति

19 वीं शताब्दी में मनोविज्ञान, व्यवहार के विज्ञान के रुप में स्थापित हुआ, शिक्षा का केन्द्रीय उद्देश्य बालक के व्यवहार परिवर्तन को मान लिया गया, तब शिक्षा मनोविज्ञान पर आधारित होने लगी । व्यवहार को प्रेरित करने वाले जो सिद्धान्त मनोविज्ञान द्वारा स्थापित किये गये, शिक्षा क्षेत्र में उनका व्यावहारिक प्रयोग प्रारंभ हुआ । रूसो की प्रकृतिवादी चिन्तन प्रणाली ने शिक्षा की परम्परागत दार्शनिक प्रवृत्ति को हिला दिया । आज रुसो के कटु आलोचकों ने भी शिक्षकी को बाल केन्द्रित स्वीकार कर लिया है । जब मनोविज्ञान के सिद्धान्तों द्वारा शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम शिक्षा, विधि, अनुशासन, विद्यालय, शिक्षक आदि के नवीन सम्प्रत्ययों का विकास होने लगा, तब बालक के अन्तर्मन में शिक्षा की महत्ता प्राप्त हो गई । अर्थात वर्तमान में बालक के मन, मस्तिष्क, संवेगों, भावनाओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा संगठन की स्थापना की जाने लगी । आज मूल प्रवृत्तियों को दमनीय नहीं माना जाता बल्कि उनके शोधन उदात्तीकरण का प्रयास शिक्षा का कार्य मान लिया गया है ।

शिक्षा की समाज शास्त्रीय प्रवृत्ति

मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति जहाँ व्यक्ति केन्द्रित शिक्षा पर बल देती है वहां समाज शास्त्रीय प्रवृत्ति समाज केन्द्रित शिक्षा पर जोर देती है । इस प्रवृत्ति के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था समाज अपने को स्वस्थ बनाये रखने के लिए करता है | बालक शिक्षा प्राप्त करने के लिए समाज से आता है । शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् ज्ञान का प्रयोग वह समाज में ही करता है । अत: शिक्षा का प्रेरक, संगठक, और प्रभावित होने वाला, समाज है । अत: बालक का विकास समाज की इच्छाओं के अनुसार शिक्षा के माध्यम से किया जाना चाहिए । इस प्रवृति के अनुसार शिक्षा का अर्थ, उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधि, विद्यालय, अनुशासन आदि का निर्धारण समाज की इच्छाओं मान्यताओं मूल्यों के आधार पर होना चाहिए | अत: समाजशास्त्रीय विधि बालक का विकास एक योग्य नागरिक के रूप में करना चाहती है । इस प्रवृति के अन्तर्गत वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक प्रवृत्तियां सामाहित हो जाती है । जैसे – क लोकतांत्रिक प्रवृत्ति, ख समाजवादी प्रवृत्ति, ग धर्म निरपेक्ष प्रवृत्ति

जो भी प्रवृत्तियों वर्तमान में देश व समाज का प्रतिनिधित्व करती है, समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति में स्वयमेव समाहित हो जाती हैं | समाजशास्त्रीय प्रवृति की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित है

(i) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति शिक्षा को एक सामाजिक प्रक्रिया मानती है ।

(ii) समाजशास्त्रीय प्रवृति शिक्षा के सामाजिक उद्देश्यों का समर्थन करती है ।

(iii) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति शिक्षा द्वारा बालक का विकास एक योग्य नागरिक के रुप में करना चाहती है ।

(iv) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति विद्यालय को समाज का प्रतिनिधि बनाने हेतु विद्यालय एवं समाज में सक्रिय सम्बन्ध स्थापित करना चाहती है ।

(v) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति विद्यालय को एक सामाजिक संस्थान के रुप में स्वीकार करती है ।

(vi) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति समाज की आवश्यकताओं और समस्याओं के पाठ्यक्रम में प्रमुख स्थान देती है ।

(vii) समाजशास्त्रीय प्रवृति पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा सामाजिक अनुभवों को श्रेष्ठ स्वीकार करती है।

(viii) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति करके सीखने के साथ-साथ कार्य करने के अवसर कक्षा-कक्ष में आवश्यक मानती है ।

(ix) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति सामाजिक अनुशासन की स्थापना पर बल देती है ।

(४) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति तकनीकी एवं व्यवसायिक शिक्षा पर बल देती है ।

(xi) समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति समाजतन्त्र के अनुकूल पाठ्यक्रमों शिक्षा विधियों एवं विद्यालयों के संगठन पर बल देती है ।

इस प्रकार शिक्षा की समाजशास्त्रीय प्रवृति शिक्षा के माध्यम से समाज की अनुकूलन शीलता की वृद्धि कर समाज के उन्नयन एवं परम्पराओं व नैतिकता तथा सामाजिक मूल्यों के संचरण तथा नवीन मूल्यों के संगठन हेतु, शिक्षा संकल्पना को समाज शास्त्रीय धरातल प्रदान करती है |

शिक्षा की समाहरक प्रवृत्ति

शिक्षा की मनोवैज्ञानिक प्रवृति वैयक्तिक विकास को महत्व देती है, जिसमें बालक केन्द्र में होता है जबकि समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति सामाजिक विकास को महत्व देती है, जिसमें शिक्षा का केन्द्रीय विषय समाज बन जाता है । शिक्षा जगत में यह द्वंद्व काफी समय तक चलता रहा । परन्तु वैज्ञानिक प्रवृत्ति ने अपने अन्वेषण में यह महसूस किया कि बालक का विकास समाज के विकास के बिना असंभव है । अर्थात् व्यक्ति का हित समाज हित के साथ और समाज का हित व्यक्ति के हित से अनुपूरक रूप से गुथा हुआ है । दोनों का एकांगी विकास नहीं हो सकता

इस आधुनिक युग में शिक्षा की समाहारिक प्रवृति का विकास हुआ । इसके प्रभाव से शिक्षा के वैयक्तिक तथा सामाजिक उद्देश्यों में समन्वय किया जाने लगा । स्वयं स्पेन्सर जहाँ एक ओर मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का समर्थन करते हुए व्यक्ति वाद का प्रोत्साहन देते है | वहीं दूसरी ओर यह भी बताते कि व्यक्तित्व का विकास केवल सामाजिक हित दवारा ही संभव है । वर्तमान में सभी शिक्षाशास्त्री एक मत से स्वीकार करते है कि व्यक्ति और समाज के हित अलग-अलग नहीं है व्यक्ति का विकास और सामाजिक कुशलता एक दूसरे के पूरक है । अत: शिक्षा के उद्देश्यों में व्यक्तिगत उद्देश्य और सामाजिक उद्देश्यों के बीच समन्वय स्थापित कर लिया गया है । जैसे ‘रुचि और प्रयत्न’ के बीच समन्वय स्थापित हो गया है । जहाँ व्यक्तिवादी विचारधारा बालक की रुचियों को महत्व देती है । समाजशास्त्री विचारधारा प्रयत्न को अधिक बल देती है । वर्तमान की नवीन अवधारणाओं में रुचि और प्रयत्न के सिद्धान्त को स्वीकार किया जाता है । अधिगम के लिए जितनी आवश्यकता रुचि की है उतनी ही प्रयत्न की । बिना प्रयत्न किये रुचि होते हुए भी परिणाम प्राप्त नहीं किया जा सकता । अत: पाठ्यक्रम निर्माण और शिक्षण विधियों में अब दोनों को समान महत्व दिया जाता है ।

तदनुसार ‘अनुशासन और स्वतंत्रता’ दोनों कभी विरोधाभासी माने जाते थे लेकिन वर्तमान की शिक्षा प्राणाली में दमनात्मक अनुशासन के स्थान पर प्रभावात्मक व मुक्तात्मक अनुशासन पर बल दिया जाता है । नवीन शिक्षा प्रणाली में बालक में आत्म निग्रह आत्म प्रबन्धन, आत्म शिक्षा, आत्म अनुशासन, स्वानुशासन जैसे गुणों के विकास का प्रयत्न किया जाता है ।।
| अस्तु शिक्षा क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रवृत्ति के आधार पर मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय प्रवृत्ति के बीच समन्वय स्थापित कर लिया गया है जिसे शिक्षा की नवीन प्रवृत्ति, समहारक प्रवृत्ति के नाम से जाना जाता है) इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्न हैं

(i)शिक्षा की समाहारक प्रवृत्ति शिक्षा के वैयक्तिक और सामाजिक उद्देश्यों के बीच समन्वय स्थापित करती

(ii) समाहार प्रवृत्ति के कारण आधुनिक शिक्षा में मनोविज्ञान और समाजशास्त्र शिक्षा के आधार बन गये है । समाहारक प्रवृत्ति ने शिक्षा में ‘रुचि और प्रयत्न’ का सिद्धान्त निर्मित किया है ।

(iii) इस प्रवृत्ति ने बालक की प्रकृति और समाज के बीच शिक्षा में समन्वय किया है ।

(v) इस प्रवृत्ति ने स्वतंत्रता और अनुशासन के बीच समन्वय स्थापित कर आत्म अनुशासन और प्रभावात्मक अनुशासन की स्थापना की है ।

शिक्षा की अति आधुनिक प्रवृत्तियाँ

विज्ञान के चरम विकास ने आधुनिक युग को भौतिकवादी युग बना दिया है । स्वास्थ्य सेवा के प्रसार और जिनेटिक इन्जीनियरिंग ने तीव्र जनसंख्या वृद्धि की है । अत: प्राकृतिक संसाधनों का असीमित दोहन प्रारंभ हुआ । -उपभोक्तावादी दृष्टि से मानव मन के संतोष को समाप्त कर दिया । अत: मानव समाज जिसने लोकतांत्रिक, समाजवादी विचारधारा को अपना कर अपनी सभ्यता को इस सोपान पर पहुंचाया है, अनेकों प्रकार की समस्या का सामना कर रहा है । शिक्षा समाज की समस्याओं को व्यवहारिक समाधान की तलाश का प्रयत्न है । अत: शिक्षा द्वारा जब इन अनेकों समस्याओं के समाधान की खोज प्रारंभ हुई तो शिक्षा में कुछ नवीन प्रवृत्तियों का विकास होता है । यद्यपि ये प्रवृतियाँ सामयिक है परन्तु शिक्षाशास्त्र के अध्येता को उनको जानना आवश्यक होता है जैसे

(i) निरक्षर प्रौढ़ो के लिए प्रौढ़ शिक्षा ।

(ii) जन शिक्षा हेतु दूरस्थ शिक्षा ।

(iii) कार्मिक जनो हेतु पत्राचार शिक्षा ।

(iv)  विद्यालय रहित अनौपचारिक शिक्षा ।

(v) मन्दबुद्धि, विकलांग जनो हेतु विशिष्ट शिक्षा ।

इसी प्रकार सामयिक समस्याओं के समाधान हेतु कुछ विशिष्ट अनुशासनों की स्थापना की गयी है।

(i) जनसंख्या शिक्षा। (ii) पर्यावरण शिक्षा । (iii) यौन शिक्षा । (iv) सामुदायिक सेवा शिक्षा । (v) उपभोक्ता शिक्षा । (vi) अल्पसंख्यक शिक्षा । (vii) ऊर्जा शिक्षा । (viii) कम्प्यूटर शिक्षा | (ix) व्यावसायिक शिक्षा । (x) प्रबन्ध शिक्षा

उपरोक्त प्रवृत्तियाँ सामयिक और नवीन है परन्तु आपात प्रबन्ध शिक्षा के इन क्षेत्रों में तीव्र विकास हो रहा है, क्योंकि मानवता के समक्ष जो भी समस्यायें उत्पन्न होती है । वह शिक्षा के द्वारा समाशोधित होती है । इस प्रकार प्रत्येक मानवीय समस्या शिक्षाशास्त्र की एक नवीन प्रवृत्ति से अलंकृत कर देती है । और यह प्रवृति समाज की नवीन आकांक्षा बन जाती है। कालान्तर यह शिक्षा का उद्देश्य बनकर शिक्षा प्रक्रिया में अपनी भूमिका स्थापित करती है । अत: यह कहना अनुपयुक्त नहीं होगा कि शिक्षा की प्रवृत्ति शिक्षा के उद्देश्यों में प्रतिबिंबित होती है ।

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