शिक्षा के आधार

शिक्षा के आधार

शिक्षा की प्रमुख चार आधार शिलाएँ हैं :मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक, सामाजिक, वैज्ञानिक

शिक्षा के मनोवैज्ञानिक आधार

मनोवैज्ञानिक आधार इतना विशद है कि शिक्षा विधि के क्षेत्र में उसकी देन अपरिमित है । इसमें वैयक्तिक भिन्नता पर आज विशेष ध्यान दिया जाता है । मनोविज्ञान शिक्षा में बालक को केन्द्र बिन्दु मानता है । 19वीं शताब्दी के मनोवैज्ञानिक विचारधारा ने शिक्षा को अधिक प्रभावित किया है । शिक्षा की व्यवस्था का आधार बालकों की रूचियों एवं आवश्यकताओं को माना है ।

शिक्षा के दार्शनिक आधार

दार्शनिक शिक्षा के दो पक्ष हैं : (i) सैद्धान्तिक पक्ष (ii) व्यावहारिक पक्ष
शिक्षा का सैद्धान्तिक पक्ष दर्शन पर आधारित है और दर्शन का सम्बन्ध जीवन से है । जीवन यापन के ढंग को दर्शन कहते हैं । दर्शन का अवलम्बन लिये बिना उद्देश्यों का निर्धारण असम्भव होगा । शिक्षा सोद्देश्य होती है तथा विभिन्न दर्शन उसके उद्देश्यों का निर्धारण करते हैं।

शिक्षा का सामाजिक आधार

बालक जीवन भर किसी न किसी समाज का सदस्य रहता है । स्कूल भी समाज का लघुरूप है । और शिक्षा का उच्चतम उद्देश्य व्यक्ति को समाज का श्रेष्ठ सदस्य बनाना है । शिक्षा कहीं भी हो कभी भी हो तथा किसी भी दशा में हो, एक ही प्रमुख उद्देश्य को लेकर चलेगी और वह है – बालक का विकास और बालक का विकास भी कैसा – सर्वांगीण । अब प्रमुख बात यह है कि बालक का विकास सदैव ही वि-पक्षीय (bi-polar) होता है ।

बालक का विकास
वैयक्तिक दृष्टिकोण (Individual Apporach)
सामाजिक दृष्टिकोण (Social Apporach)
जीव शास्त्रीय
मनोवैज्ञानिक (Biological Heridity) (Psychological Environment) (बुद्धि-विवेक)
(जो प्राप्त है)

(i) वैयक्तिक दृष्टिकोण – बालक के वैयक्तिक विकास में जीव शास्त्र का यथेष्ट योग रहता है । क्योंकि बालक के व्यवहार में जैविकीय तत्वों का सीधा प्रभाव रहता है ।
जन्म जात संस्कारों के अतिरिक्त वातावरण एवं सीखने की क्रिया का भी बालक पर प्रभाव पड़ता है । जब जीव-शास्त्र व मनोविज्ञान दोनों शास्त्र व्यक्ति के अध्ययन को केवल महत्व ही प्रदान नहीं करते हैं, वरन् ब्राऊन के शब्दों में – “जीव-शास्त्र व मनोविज्ञान ने अधिकतर शिक्षा पर प्रभुत्व जमा रखा है ….. विधियों का पाठ्यक्रम और स्कूल का प्रबन्ध तक व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक विचारों पर आधारित है ।” (Until recently biology and psychology have largely dominated education, have been based on psychological concepts of the individual.)

(ii) सामाजिक दृष्टिकोण – एक व्यक्ति अनेक समूहों व समुदायों का सदस्य होता है । कई लोगों के सम्पर्क में आता है। अपनी सामाजिक संस्कृतियों को आत्मसात करते हुये भी वह एक व्यक्ति से मानव बनने में समर्थ होता है । कुटुम्ब, धर्म, प्रेस, चलचित्र तथा साहित्य आदि सभी व्यक्ति के विकास में योग देते हैं । हम मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी मानते हैं। । अतः समाज के बिना उसका अस्तित्व भी सम्भव नहीं । इसके अलावा शिक्षा भी समाज में निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है ।
इसीलिये यदि हमें शिक्षा का पुनर्संगठन (Re-Organization) या पुर्न-व्यवस्था (Reconstruction) करना है तो हमें अवश्य ही व्यक्ति के परे जाना होगा । शैक्षिक प्रक्रियाओं व पाठ्यक्रम के निर्माण के लिये शिक्षा को घर की परिधि में प्रवेश करना ही होगा, तथा समाज के निकट आना ही होगा एवं सम्पूर्ण समाज का ध्यान रखना ही होगा ।

इसीलिये स्कूल में जो सैद्धान्तिक शिक्षा दी जाती है, उसका सम्बन्ध मनुष्य की पूर्ण शिक्षा से अवश्य ही होना चाहिये । अत: इसके लिये हमें समाज के बारे में भी जानकारी रखनी आवश्यक है ।

वैज्ञानिक आधार

19वीं शताब्दी तक आते-आते विज्ञान के क्षेत्र में उन्नति हुई और उसका जीवन पर प्रभाव पड़ा । इसके फलस्वरूप शिक्षा में विज्ञान के विषयों को सम्मिलित किया गया और विज्ञान के शिक्षण में रूचि उत्पन्न होने लगी । पाठ्यक्रम में भारी परिवर्तन आया । परम्परागत पाठ्यक्रम में उनका महत्व शिक्षण-विधियों में सुधार आदि वैज्ञानिक प्रवृत्तियों की ही विशेषता रही है ।

विज्ञान ने पाठ्यक्रम में परिवर्तन के साथ-साथ हमारे मनोवृत्ति को मनोवैज्ञानिक बना दिया । शिक्षण में वैज्ञानिक आविष्कारों का प्रयोग प्रारम्भ हुआ । रेडियो, फिल्म प्रोजेक्टर, रिकार्ड प्लेयर, टेप, दृश्य-श्रव्य सामग्री आदि का प्रयोग बढ़ने लगा । शैक्षिक तकनीक की शुरूआत हुई । जैसे कम्प्यूटर के द्वारा शिक्षण की व्यवस्था आदि । इन सब उपलब्धियों को शिक्षा प्रक्रिया से जोड़ना ही होगा ।

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