शिक्षा के विभिन्न लक्ष्य

शिक्षा के विभिन्न लक्ष्य

“Education is supposed to develop an integrated human being and to prepare young people to perform useful functions for society and to take part in collective life.But when that society is changing from day to day it is difficult to know how to prepare and what to aim at.” (Jawalar Lal Nehru Azad memorial Lect.P.23)

अभी तक हमने शिक्षा के लक्ष्यों की स्थापना व उसके वर्गीकरण का सामान्य अध्ययन कर विभिन्न आयोगों द्वारा निर्देशित लक्ष्यों का अध्ययन किया हैं । अब शिक्षा के विभिन्न लक्ष्यों को पृथक-पृथक रूप में देखना अधिक युक्ति संगत प्रतीत होता हैं जिसका क्रमानुसार वर्णन निम्न हैं।

शारीरिक विकास का लक्ष्य

मनुष्य एक मनो-शारीरिक प्राणी है शरीर उसके जीवन के समस्त क्रियाओं का आधार है। इसी आधार पर उसका मानसिक, चारित्रिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उत्थान व पतन टिका होता है । अत: शिक्षा शास्त्र सदैव शारीरिक विकास को अपना प्राथमिक लक्ष्य स्वीकार करता है । कालीदास का कहना है-“शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम् ।” शरीर संसार के सारे धर्मो (क) का माध्यम है । अत: औचित्य पूर्वक इसका संरक्षण करना चाहिए । भौतिकवादी समाजों में स्वास्थ्य शिक्षा को सर्वोपरि महत्व दिया जाता है क्योंकि वहाँ शारीरिक सुख ही जीवन के लक्ष्य होते है । आध्यात्मवादी समाजों में शरीर को सत्य तक पहुँचाने का साधन माना गया है परन्तु बिना साधन के साध्य तक नहीं पहुंचा जा सकता अत: दोनों प्रकार की समाज व्यवस्था में शरीर के स्वस्थ विकास का उद्देश्य समान रूप से स्वीकारा गया है ।

शारीरिक विकास का आशय कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों का विकास, स्वास्थ्य रक्षा, जन्मजात शक्तियों का विकास एवं उदात्तीकरण माना जाता है । इसके लिए उत्तम स्वास्थ्य के नियम बताये जाते है । व्यायाम, आसन, खेलकूद के साथ स्वच्छता के नियमों का ज्ञान के माध्यम से दिया जाता है | शरीर के अंगों, उपांगों बाह्य व आन्तरिक संरचना, शारीरिकी अन्तःक्रियाओं तथा रोगों और रोगों से बचाव का ज्ञान शिक्षा द्वारा ही बालकों तक पहुँचाया जाता है, जिससे बालक सर्वोत्तम स्वास्थ्य को प्राप्त कर अपना विकास कर सके ।

परन्तु सिर्फ शारीरिक विकास ही शिक्षा का उद्देश्य नहीं माना जा सकता । प्राचीन ग्रीक शिक्षा नगर की मान्यता थी कि मनुष्य, शरीर और मन दोनों का समुच्चय है । शरीर और मस्तिष्क दोनों का विकास समान रूप से होना चाहिए । अस्वस्थ व्यक्ति समाज के लिए समस्या बन जाता है इस सन्दर्भ में डब्ल्यू हाल का कथन समीचीन प्रतीत होता है- “अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखिए उसकी अवहेलना करने का आपको कोई अधिकार नहीं है क्योंकि ऐसा करके आप अपने तथा दूसरों के लिए भार बन जाते है |”

ज्ञानात्मक विकास का लक्ष्य

आदिकाल से शिक्षा ज्ञान या विद्या से सम्बन्धित रही है शिक्षा का परिणाम ज्ञान है। जो शिक्षा द्वारा ही संभव होता है | ज्ञान एक मानसिक शक्ति है अत: ज्ञानात्मक विकास मानसिक विकास को प्रेरित करता है प्राचीन भारतीय परम्परा के अनुसार अमृतम् तु विद्या श्वेता अथवा ‘सा विद्या या विमुक्तये इसी बात को ग्रीक परम्परा में सुकरात कहते है ‘ज्ञान ही सदगुण है’ ।
“Knowledge is Virtue” अत: शिक्षा के ज्ञानात्मक लक्ष्य की स्थापना शिक्षा संस्था के जन्मकाल में हो गयी थी इसी तथ्य को अरस्तू ‘ज्ञान ही शक्ति है । ‘Knowledge is power’ कहते है । कोमेनियस के विचार में ‘ज्ञान ज्ञान के लिए’ Knowledge for knowledge की धारणा आयी । परिणामस्वरूप ज्ञानात्मक विकास का उद्देश्य सीमित होने लगा | जब ज्ञान को सिर्फ सूचना संग्रहण या भाषा विकास तक सीमित कर दिया गया, तब इस उद्देश्य की कटु आलोचना प्रारंभ हो गयी । विद्यालय अपना स्वरूप खोने लगे और एडम्स को विद्यालयों को ज्ञान की दुकान कहने को बाध्य होना पड़ा । क्योंकि इस उद्देश्य की प्राप्ति सिर्फ कुछ तथ्यों को रट कर परीक्षा पास करने तक ही सीमित हो गयी ।।

उपरोक्त विरोधाभास ज्ञान के सम्प्रत्यय की अस्पष्टता के कारण आया, क्योंकि इस दौरान ज्ञान शब्द की परिभाषा ही बदल गयी थी पूर्व में ज्ञान के अर्थ में विभिन्न मानसिक शक्तियों का दयोतन होता था, कलान्तर तथ्यों के संकलन या रटने को ज्ञान कहा जाने लगा । वास्तव में यह उद्देश्य अपने आप में पूर्ण और शिक्षा के समस्त उद्देश्यों का स्वयं में समन्वय करने वाला है । ज्ञान की उत्पत्ति ऐन्द्रिक अनुभवों से प्रारंभ होती है । लेकिन यह अनुभव या तथ्य ज्ञान नहीं होते काण्ट ने इन्हें ज्ञान का कच्चा माल कहा है, इनसे उत्पन्न विवेक शक्ति ही व्यवहार का परिमार्जन करती है | ज्ञान के रुप में वहीं अन्त शक्ति ही विवेच्य है जो सम्पूर्ण शिक्षा की समग्र निष्पत्ति है ।। | इसी सन्दर्भ में फैरार कहते हैं।- ‘ज्ञान समझदारी के साथ विवेक है, व्यवस्था के साथ शक्ति है, दया के साथ भलाई है धर्म के साथ सद्गुण, जीवन और शान्ति है ।

नैतिक और चारित्रिक विकास का लक्ष्य

संसार में न तो धन का प्रभुत्व है और न बुद्धि का । यदि किसी का प्रभुत्व है तो वह चरित्र और पवित्रता का । शिक्षा के पारम्परिक इतिहास का अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है। कि चरित्र निर्माण का लक्ष्य सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया है । अर्थात् शिक्षा द्वारा व्यक्ति में नैतिक सदगुणों का आरोपण किया जाना चाहिए | प्रत्येक समाज के अपने आचारविचार सम्बन्धी कुछ सिद्धान्त और नियम होते है । सामान्यत: इन नियमों का पालन करना नैतिकता है और इन नियमों का पालन करने की आन्तरिक शक्ति चरित्र है । इस प्रकार नैतिकता और चरित्र अभिन्न होते है परन्तु विभिन्न अनुशासनों में नैतिकता और चरित्र की व्याख्या भिन्न-भिन्न तरीके से की गई है । समाज विज्ञान ‘समाज सम्मत आचरण को नैतिकता एवं चरित्र मानता है । मनोविज्ञान चरित्र को अच्छी आदतों का पुंज मानता है। धर्मशास्त्र, इन्द्रियनिग्रह और धर्म सम्मत आचरण को नैतिक चरित्र मानता है । साहित्य में नैतिकता और चरित्र पृथक-पृथक है । चरित्र व्यवहार का संकुल है जो अच्छा या बुरा हो सकता है जबकि लोक सम्मत आचरण नैतिकता है । शिक्षा के क्षेत्र में जब चरित्र और नैतिकता की बात की जाती है तो यहाँ व्यक्तियों के समाज सम्मत आचरण को ही चरित्र कहा जाता है ।

इस प्रकार चरित्र एक प्रकार से व्यक्ति की वैचारिक स्वीकृति है, जो विभिन्न परिस्थितियों में उसके व्यवहार का नियमन करती है । जर्मन शिक्षाशास्त्री हरबर्ट का कहना है। “शिक्षा के समस्त कार्यों को एक शब्द में प्रकट किया जा सकता है और यह शब्द ही नैतिकता।”

“The one and the whole work of Education may be summed up in the concept of morality”
Herbert हरबर्ट ने ‘आन्तरिक दृढ़ता और एकता’ को चरित्र कहा है । मानव का आचरण उसकी जन्मजात शक्तियों पर आधारित होता है । जन्मजात प्रवृत्तियों का परिमार्जन शिक्षा द्वारा किया जाना चाहिए । जिससे उसके विचार समाज अनुकूल बन सके । इसके लिए शिक्षा के विभिन्न उपकरणों द्वारा उसमें सदगुणों का विकास किया जाना आवश्यक होता है । अत: शिक्षा द्वारा बालक के अन्दर प्रेम, सहानुभूति दया, सद्भावना और न्याय प्रियता का विकास ही किया जाना अपेक्षित है । सदगुणों का चारित्रीकरण शिक्षा का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए | 1932 में – राष्ट्रीय शिक्षा पर परिचर्या करते समय जब गांधीजी से प्रश्न किया गया कि स्वतंत्र भारत की शिक्षा के क्या उद्देश्य होंगे, तो गांधी ने निःसंकोच उत्तर दिया था ‘चरित्र निर्माण करना । गाँधीजी का कहना हैं- “मैं अनुभव करता हूँ कि संसार के सभी देशों को केवल चरित्र की आवश्यकता है और चरित्र से कम किसी वस्तु की नहीं।

अत: व्यक्ति समाज और राष्ट्र के सर्वोच्च विकास के लिए चरित्र का निर्माण शिक्षा का अति आवश्यक विषय है । परन्तु कुछ विद्वानों ने चरित्र और नैतिकता के संप्रत्यय की अस्पष्टता का प्रश्न उठाया है कि आज तक नैतिकता और चरित्र का सर्वमान्य सम्प्रत्यय स्पष्ट नहीं हो सका, वास्तव में चरित्र और नैतिकता किसी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का व्यक्तिगत होना है जो उसके पर्यावरण, परम्परा और दर्शन के द्वारा विकसित होता हैं अत: इसकी सर्वमान्य परिभाषा भले ही न दी जा सके परन्तु इसकी आवश्यकता जीवन में प्रत्येक क्षण होती है एन. आर. स्वरूप सक्सेना के अनुसार – “जिस देश के नागरिक बड़ो का आदर नहीं करते, जो सत्य नहीं कहते, जो न्याय को न्याय नहीं समझते, जो चोर बाजारी, घूस लेने से धन कमाने में अपना अपमान नहीं समझते उस देश का पतन होना निश्चित है ।”

अत: समाज और राष्ट्र के अस्तित्व के लिए बालकों में चरित्र निर्माण का उद्देश्य शिक्षा का मूल उद्देश्य जाने लगा है ।।

व्यावसायिक विकास का लक्ष्य

शिक्षा व्यवहार के परिमार्जन के साथ कौशलों का विकास करती है, व्यक्ति अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की प्राप्ति के लिए ही शिक्षा उपक्रम में नियोजित होता है । परम्परा से शिक्षा संकल्पना जब से विकसित हुई है, विभिन्न कौशलों में पारंगत करना शिक्षा के उद्देश्य रहे है । यही कौशल व्यक्ति को आजीविका का साधन बनते है, अनौपचारिक शिक्षा के अन्तर्गत तो यह उद्देश्य सदैव विद्यमान रहा है और आज भी है । औपचारिक शिक्षा में इस उद्देश्य का प्रादुर्भाव प्रयोजनवादी दार्शनिक चिन्तन के बाद हुआ । विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन में विशिष्ट आवश्यकता को जन्म दिया है । इस प्रकार शिक्षा में व्यावसायिक कुशलता का उद्देश्य अधिक प्रभावशाली बन गया है । प्रकृतिवादी और प्रयोजनवादी आन्दोलनों ने शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को अधिक शक्तिशाली बनाया है | परतंत्र भारत में भुखमरी और बेरोजगारी का समाधान करने के लिए गांधी जी ने बेसिक शिक्षा द्वारा व्यावसायिक उद्देश्यों की प्राप्ति की संकल्पना प्रस्तुत की ।

पाश्चात्य सभ्यता में संयुक्त राज्य अमेरिका ने शिक्षा के व्यावसायिक उद्देश्य को गंभीरता से लिया । वहां सामान्य शिक्षा के साथ-साथ निर्देशन और परामर्श का समानान्तर संगठन खड़ा कर दिया गया जिससे बालक की रुचियों और योग्यताओं के पहले से पहचाना जा सके और योग्य होने पर उसे सम्बन्धित कौशल के व्यवसाय से सन्नध कराकर उसे एक उपयोगी नागरिक बनाया जा सके । यद्यपि शिक्षा के इस उद्देश्य की आलोचना “Bread and Butter Aim White coller Aim” जैसे शब्दों से सम्बोधित करके की गई है । परन्तु यह सत्य है कि रोजगार विहीन शिक्षा शिक्षितों के लिए एक अभिशाप है । अत: सम्पूर्ण शिक्षा योजना में इसे अपना केन्द्रीय उद्देश्य बनाना चाहिये । महात्मा गांधी ने कहा है- ‘ ‘सच्ची शिक्षा को बालक और बालिकाओं के लिए बेकारी के विरुद्ध एक प्रकार की सुरक्षा होनी चाहिए । ”
“True Education ought to be children a kind of insurance against unemployment”
M.K.Gandhi

समन्वित विकास का लक्ष्य

मनोविज्ञान ने व्यक्तित्व को एक इकाई के रूप परिभाषित किया है । शरीर, मन पृथक नहीं है । अत: मानसिक शक्तियों को अलग-अलग विभाजित नहीं किया जा सकता और न ही शरीर और मन को अलग विकास के पायदानों में रखा जा सकता है | व्यक्ति जन्म से जो कुछ प्राप्त करता है, उसका समन्वित विकास शिक्षा द्वारा किया जाना चाहिए | पेस्टालॉजी समन्वित विकास के सन्दर्भ में लिखते है- “शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक सांमजस्य पूर्ण तथा प्रगतिशील विकास है ।
“Education is the natural harmonious and progressive development of man’s innate Powers.” – Pestalozzi

प्राय: शिक्षा के अन्य उद्देश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व के किसी एक पक्ष को विकसित करने को शिक्षा की उद्देश्य मानते है लेकिन व्यक्तित्व का विकास समग्रता के साथ व्यक्ति की विभिन्न शक्तियों के समन्वित विकास के रूप में होना चाहिए । प्रकृतिवादियों ने इस उद्देश्य को बहुत महत्वपूर्ण माना है । रुसो सहित रविन्द्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी, अरविन्द घोष इसका समर्थन करते है । अरविन्द घोष ने बालक के विकास की पांच क्रियाये बतायी है । जिसका विकास समग्रता से किया जाना चाहिए | ये क्रियाएं है –  (i) भौतिक (ii) प्राणिक (iii) मानसिक (iv) भावात्मक (v) आध्यात्मिक
उपरोक्त पांचों दिशाओं में बालक की बाह्य और आन्तरिक शक्तियों का समान विकास शिक्षा द्वारा किया जाना चाहिए | इसी सन्दर्भ में महात्मा गांधी शिक्षा के विषय में कहते हैं- ‘ ‘शिक्षा से मेरा तात्पर्य है, बालक और मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क व आत्मा का उत्कृष्ट विकास।
“By Education I mean an all round drawing out of the best in chile and man-body mind and spirit.” – -M.K.Gandhi

शिक्षा के इस लक्ष्य को शिक्षाशास्त्रियों के बीच व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ है । किन्तु इसकी कुछ सीमायें भी है, व्यक्ति की वैयक्तिकता के कारण सभी की शक्तियाँ पृथक-पृथक होती है जिनका वैज्ञानिक विभाजन संभव नहीं होता । प्रत्येक व्यक्ति किसी एक शक्ति का अधिकतम विकास करने में सक्षम होता है । सभी में समान्तर शक्तियों का विकास असंभव होता है । अतः यह उद्देश्य विशिष्टीकृत कला कौशलों के विकास में बाधक सिद्ध होता है । वास्तव में सन्तुलित विकास की सीमा निर्धारण करना संभव नहीं है । अत: सर्वांगीण विकास का स्पष्ट आशय अभी तक सामने नहीं आया है फिर भी शिक्षा का यह लक्ष्य शिक्षा क्षेत्र में व्यापक महत्व प्राप्त करता है ।।

नागरिकता के विकास का लक्ष्य

समाजवादियों ने नागरिकता के लक्ष्य की व्यापक प्रशंसा की है। राज्य समाज का अंग है, प्रत्येक व्यक्ति किसी राज्य या समाज का सदस्य बनकर ही जन्म लेता है । यह सदस्यता उसे कुछ अधिकार प्रदान करती है साथ ही कुछ कर्तव्य भी निश्चित कर देती है । प्रत्येक समाज व राष्ट्र अपनी व्यवस्था (तन्त्र) के अनुकूल नागरिकों का निर्माण करना चाहता है अत: शिक्षा उपक्रम में नागरिकता सम्बन्धी उद्देश्य का जन्म होता है । विश्व के विभिन्न समाजों में अपनी संस्कृति और पर्यावरण के अनुकूल राजव्यवस्था को स्वीकार किया गया है । बालक अपने भावी जीवन में उसी व्यवस्था के अन्तर्गत सक्रिय होने वाला है । अत: स्वयं बालक और समाज व राज्य के उत्थान हेतु नागरिकता का उद्देश्य आवश्यक हो जाता है ।
नागरिकता की शिक्षा वास्तव में अधिकारों का ज्ञान और कर्तव्यों का प्रशिक्षण है । नागरिकता सिर्फ राज्य द्वारा पारित अधिनियमों की पालना नहीं है । बल्कि पालना के साथ उनकी सकारात्मक आलोचना और राज्य तथा समाज के विकास में अपनी सृजनात्मक भूमिका का प्रशिक्षण है ।

माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952 -53) का कथन दृष्टव्य है| “भारत ने अभी हाल में राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त की है, उसने पर्याप्त विचार विमर्श के पश्चात् स्वयं को धर्म निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया है । इसलिए शिक्षा दवारा नागरिकों में ऐसी आदतों, अभिरुचियों और चारित्रिक गुणों का विकास किया जाए जिससे कि वे लोकतांत्रिक नागरिक के दायित्वों का भली प्रकार से निर्वाह कर सकें और उन विघटनकारी प्रवत्तियों को रोक सकें जो व्यापक, राष्ट्रीय एवं धर्म निरपेक्ष दृष्टिकोण के विकास में बाधक है।”

भले ही नागरिकता की शिक्षा का जन्म स्पार्टा और जर्मनी के उग्र राष्ट्रवाद से हुआ है। लेकिन वर्तमान में यह प्रत्येक लोकतांत्रिक और उदारवादी राष्ट्र की अनिवार्यता है, क्योंकि नागरिकता का प्रशिक्षण प्रजातंत्रात्मक शासन प्रणाली की रीढ़ है । शिक्षा का यह उद्देश्य कल्याणकारी राज्य की प्राप्ति की दिशा में सक्रिय भूमिका अदा करता है । अरस्तु का कथन हैं। – “हमारा उद्देश्य है उदार शिक्षा के द्वारा अच्छे नागरिक को उत्पन्न करना जो स्वामिभक्त, आज्ञाकारी सहिष्णु तथा न्यायप्रिय हो ।”
नागरिकता का समुचित प्रशिक्षण जीवन की चार दिशाओं से किया जाना चाहिए

1. आर्थिक जीवन का प्रशिक्षण । 2. सामाजिक जीवन का प्रशिक्षण 3. सांस्कृतिक जीवन का प्रशिक्षण 4. राजनैतिक जीवन का प्रशिक्षण

उक्त चारों क्षेत्रों के सघन प्रशिक्षण के उपरान्त व्यक्ति में आर्थिक कुशलता और आत्म निर्भरता सामाजिक समायोजन शीलता, सांस्कृतिक अवयवों के प्रति सम्मान पूर्ण आलोचनात्मक सृजनात्मकता, देश के संविधान के प्रति सम्मान और राष्ट्र की गरिमा का अवबोध विकसित होता है, जिससे राष्ट्र और समाज निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर होता है ।

नागरिकता के लक्ष्य की प्राप्ति के समय शिक्षा उपक्रम के सदैव सजग रहना चाहिए, कि उग्रराष्ट्रवाद नागरिकता का पर्याय नहीं है बल्कि मानवता का हित ही इसका साध्य है । एच. एच. हार्न लिखते हैं
राज्य में मानव का नागरिकता स्थान है । चूँकि राज्य समाज की संस्थाओं में से एक संस्था है, और चूंकि मानव के अपने साथियों के साथ सदैव संगठित सम्बन्धों के साथ रहना है। इसलिए नागरिकता को शिक्षा के आदर्श के क्षेत्र से बाहर नहीं रखा जा सकता । ”
“Citizenship is man’s place in the state. As the state is one of the permanent institutions of society and as man must ever live in organized relations with his fellows citizenship cannot be omitted from the.”

पूर्ण जीवन के विकास का लक्ष्य

“उन्नीसवीं सदी में विज्ञान के विकास के साथ शिक्षा क्षेत्र में पूर्ण जीवन के उद्देश्य की स्थापना होती है । हरबार्ट स्पेन्सर ने इसे मूर्त रूप देकर शिक्षा जगत में स्थापित किया है। स्पेन्सर का कहना है “शिक्षा को हमें पूर्ण जीवन के नियमों और ढंगों से परिचित कराना चाहिए । शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य हमें जीवन के लिए इस प्रकार तैयार करना है कि हम उचित प्रकार का व्यवहार कर सके तथा शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा का पूर्ण सदुपयोग कर सके।”.

“Education must make us familiar with the laws and ways of complete living. Its most important task is to prepare us for life in such way that we may be able to able to order the ruling of conduct, to treat the body the soul property.” Herbert Spencer

स्पेन्सर के अनुसार शिक्षा द्वारा व्यक्ति का इतना विकास अवश्य किया जाना चाहिए कि वह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आनी वाली समस्याओं का समाधान कर सके, पूर्ण साहस एवं अर्तदृष्टि के साथ उनका समाधान ढूँढे । साथ-साथ उसमें अपने व्यवहार के नियंत्रण एवं उसे सही दिशा देने की क्षमता का विकास हो । इसी सन्दर्भ में स्वामी विवेकानन्द कहते हैं| “शिक्षा का अभिप्राय है मानव का उन्नयन करके उसे पूर्णता प्रदान करना | कतिपय विद्वानों ने सम्पूर्ण जीवन के लक्ष्य को अनिश्चित माना है एवं इसे अमनोवैज्ञानिक व बालक की मूल प्रवृत्तियों का विरोधी बताया है । वास्तव में यह दोष इसलिए लक्षित होता है कि स्पेन्सर महोदय विज्ञान विषयों पर अधिक जोर देते है । व्यक्ति में भौतिक उत्थान को अधिक महत्व देने के कारण बालक के भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास के प्रति इस उद्देश्य के अन्तर्गत रूखा व्यवहार दिखायी देता है । भले ही इसे शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य न स्वीकार किया जाय, फिर भी यह उद्देश्य व्यापक और जीवन के बहुमुखी विकास का रास्ता सुझाता है ।

शेरवुड और एण्डरसन का कथन उचित ही है  “व्यक्ति को जीवन की विभिन्न समस्याओं के लिए तैयार करना-शिक्षा का संपूर्ण उद्देश्य है या होना चाहिए ।”
“The whole objective of education is or should be to prepare the individual to face the various problems of life” –  Sherwood & Andorson

समायोजन का विकास

प्राणीशास्त्रियों ने योग्यतम की उत्तरजीविता के सिद्धान्त पर अनुकूलन या समायोजन का उद्देश्य शिक्षा शास्त्र में स्थापित करते है | व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक अपने भौतिक और सामाजिक पर्यावरण के साथ समायोजन करता है । उसकी समायोजन शीलता उसकी और समाज की प्रगति का आधार बनाती है । अत: शिक्षा द्वारा व्यक्ति की समायोजन शीलता का अधिकतम विकास किया जाना चाहिए | कुसमायोजिता व्यक्ति स्वयं और समाज तथा मनुष्यता के लिए घातक होता है | कुसमायोजित व्यक्ति समूह व समाज के लिए अनेकों समस्यायें उत्पन्न करते है । सभ्य समाज की अधिकतम ऊर्जा इन्हें नियंत्रित करने में लग जाती है । अत: समाज तथा व्यक्ति दोनों के विकास के लिए समायोजन अति आवश्यक है । अत: इस उद्देश्य को शिक्षा का केन्द्रीय उद्देश्य होना चाहिये ।

प्राय: इस उद्देश्य के आलोचकों ने इसे संकुचित उद्देश्य बताया है क्योंकि मनुष्य सदैव परिस्थितियों के साथ समायोजन ही नहीं करता बल्कि वह उन्हें नियंत्रित भी करता है । अत: व्यक्ति को शिक्षा द्वारा सिर्फ अनुकूलन ही नहीं परिस्थितियों पर नियंत्रण करना भी सीखना होता है ।

परन्तु मनुष्य बहुधा परिस्थितियों के साथ समायोजन करता है उसका और उसके समाज का व्यक्तिगत और समष्टिगत हित उसकी समायोजन शीलता पर निर्भर करता है । कतिपय परिस्थितियों में ही वह पर्यावरण को अपने अनुकूल बनाने में सक्षम होता है । अत: समायोजन शीलता के विकास के उद्देश्य को नकारा नहीं जा सकता ।।

अवकाश का सदुपयोग

अवकाश का आशय उस समय से है जिसमें कोई नियोजित कार्य न किया जाय । बल्कि सुविधा और स्वेच्छा से कार्य या मनोरंजन द्वारा समय का सदुपयोग किया जाय । रंगनाथन के अनुसार- “अवकाश का तात्पर्य ऐसे समय से है जिसमें व्यक्ति अपनी शारीरिक, आर्थिक, स्वास्थ्य सम्बन्धी तथा आध्यात्मिक शक्तियों के वशीभूत होकर किसी कार्य को न करें।”
“Lesiure is that time that is unoccupied with force & by physical economic, hygienic and spiritual necessities.” Rangnathan

इस उद्देश्य के समर्थकों का मानना है कि मानव सभ्यता आज जिस विकास के सोपान पर पहुंची है, उसका श्रेय उन लोगों को जाता है, जिन्होंने अपने अवकाश का सदुपयोग कर सृजनात्मक कार्य किये हैं। किसी भी व्यक्ति का उत्थान उसके अवकाश के सदुपयोग पर निर्भर होता है कार्यावस्था के समय वह अपनी समग्र शक्तियों को सृजनात्मक नहीं बना सकता, बल्कि अवकाश के समय ही व्यक्तित्व में समग्रता होती है और सृजन उदगमीत होता है । इसीलिए महानतम अनुसंधान, साहित्य, संगीत को महानतम कृतियाँ अवकाश के समय ही प्रस्फुटित होती हैं । प्राचीन ग्रीक परम्परा में स्कूल शब्द का निहितार्थ वह स्थान या जहां अवकाश के समय लोग एकत्रित होकर परिचर्या करते थे ।

वर्तमान परिवेश में कार्य का विभाजन इस प्रकार हो गया है कि व्यक्ति अपनी समग्रता के कार्यक्षेत्र में भी प्रदर्शित कर सकता है । अवकाश काल को प्राय: विश्राम और मनोरंजन के लिए निर्धारित कर दिया गया है परन्तु आज भी वहीं लोग अधिक सफल होते है जिन्होंने अवकाश के समय को अवकाश न मानकर कार्य के प्रति समग्रता प्रदर्शित की और अवकाश काल में व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों, कला, साहित्य, सौन्दर्यानुभूति दार्शनिक तत्व चिन्तन द्वारा पूर्णता प्रदान की है । वर्तमान में भले ही इसके विधिवत प्रशिक्षण को अस्वीकार किया जाता है और इसे पूर्ण उद्देश्य की श्रेणी में नहीं रखा जाता परन्तु इसके महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि अवकाश का समय जीवन का एक बड़ा भाग होता है, उसे उपयोगी बनाकर व्यक्ति स्वयं और समाज का हित साधन करने में समर्थ होता है | इसीलिए समय की महत्ता का प्रशिक्षण शिक्षा के अन्दर समहित होता है ।

आत्माभिव्यक्ति

व्यक्तिवादी विचारकों का मत है कि मानव प्रतिक्षण स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहता है । इसी आत्म अभिव्यक्ति के माध्यम से वह सीखता है और जो सीखता है उसके पीछे अभिव्यक्ति की पिपासा होता है । अस्तित्ववादी और मनोविश्लेषणवादी विचार धाराओं ने शिक्षा के अन्तर्गत इस उद्देश्य को स्थापित किया है । अस्तित्ववादियों के अनुसार सम्पूर्ण व्यक्तित्व अस्तित्व की सिद्धि के प्रयास से प्राप्त होता है । मनोविश्लेषणवादियों का कहना है कि व्यक्तित्व के जो दुर्गुण होते है वे समुचित अभिव्यक्ति न मिलने के कारण होते हैं । फ्रायड ने मनुष्य की अव्यक्त वासनाओं दवारा भावना ग्रन्थियों के निर्माण और परिणाम स्वरुप कुण्ठा आदि के द्वारा अनेकों विकृतियों के जन्म का सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है ।। यदि शिक्षा के दवारा व्यक्ति को अपनी भावनाओं की समग्र अभिव्यक्ति के अवसर प्राप्त कराये जाये, तो व्यक्ति प्राकृतिक रूप से सीखता और समझता चला जायेगा । इससे बालक की मूल प्रवृत्तियों के स्वाभाविक दिशा प्राप्त होगी उसके व्यक्तित्व का प्राकृतिक विन्यास होगा । अत: शिक्षालय का संगठन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि वहां बालक को अधिकतम आत्म अभिव्यक्ति के अवसर प्राप्त हों । | इस विचारधारा में व्यक्ति के असीमित स्वतंत्रता की स्वीकृति दी गई है । जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए घातक सिद्ध होती है । आत्माभिव्यक्ति आवश्यक है लेकिन नियंत्रित आत्माभिव्यक्ति ही व्यक्तित्व का विकास है । वार्कर ने ठीक ही कहा है- ‘ सुन्दरता कुरुपता के अभाव से नहीं है, इसी प्रकार स्वतंत्रता नियंत्रणों का अभाव नहीं है ।
“Beauty is not absence of ugliness, so liberty is not absence of restraint.”

सौन्दर्यबोध का विकास

शिक्षा जगत में सौन्दर्य शास्त्रियों का मानना है कि मानव जीवन का उद्देश्य सौन्दर्य का अनुभव है । यदि मनुष्य में इरा कला का विकास नहीं होता तो वह पशु के समान होता है । व्यक्तित्व के सभी अंगों का विकास सौन्दर्यानुभूति के साथ सुचारु और सम होता है । वासनाओं का शोधन करके सौंदर्यानुभूति मनुष्य को मनुष्यता के धरातल पर स्थापित करती है अत: शिक्षा द्वारा व्यक्ति में सौन्दर्यबोध का विकास किया जाना चाहिए ।

सौन्दर्य शब्द के सम्प्रत्यय में भिन्नता पायी जाती है । कोई प्रकृति की नीरवता में, कोई मानव के रुप में कोई साहित्य और कला में सौन्दर्य की उपस्थिति मानता है । सामान्य रूप से जहां सत्यता का अनुभव होता है वहां सौन्दर्य का सृजन होता है । परन्तु सत्य का अस्तित्व तो व्यक्ति के मूल्यों पर आधारित है, अत: सौन्दर्यबोध के लिए मूल्यों के शिक्षण और प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए । परन्तु यह भी सत्य है कि मानव जीवन की विकास यात्रा सुन्दरता की खोज से प्रारंभ होती है । इसलिए यह जीवन का महत्वपूर्ण लक्ष्य है इसलिए शिक्षा का उद्देश्य मानने में इसे कठिनायी कोई नहीं होनी चाहिए ।

आत्मानुभूति की प्राप्ति

शिक्षा जगत में आत्मानुभूति, आध्यात्मिक, विकास के अर्थ में देखी जाती है, प्राचीन काल से वर्तमान काल तक मनुष्य स्वयं की खोज करता रहा है । अध्यात्मिक दृष्टि के अनुसार आत्मा का पूर्ण विकास जीवन का लक्ष्य है । अत: शिक्षा द्वारा वह सारे प्रयत्न किये जाने चाहिए जो आत्मविकास और आत्म अनुभूति में सहायक होते है।

शिक्षा का यह उद्देश्य प्राचीनकाल से शिक्षा को आदर्शवादी दृष्टि प्रदान करता रहा है। आधुनिक युग में वैज्ञानिक चेतना के विकास के साथ विज्ञानवादियों ने इस उद्देश्य को प्रासंगिक सिद्ध करने का प्रयास किया है । परन्तु प्रकृति के समक्ष मनुष्य अब भी बहुत छोटा है | उसका सारा ज्ञान विज्ञान अपने को परिभाषित करने में समर्थ नहीं है । जहां भौतिक विज्ञानों की सीमा प्रारंभ होती है वहीं से अध्यात्मकता का जन्म होता है । अत: आज भी मनुष्य के चरम सुख और शान्ति के लिए आध्यात्म ही सहज मार्ग है | आत्म साक्षात्कार को पिपासा जीवन की तलाश है ।

शिक्षा के उक्त उद्देश्यों का अध्ययन करने में यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा के उद्देश्य बहुमुखी है जीवन के जितने क्षेत्र हो सकते है, जीवन में जितने प्राप्तव्य हो सकते है सब के सब शिक्षा के उद्देश्य बनाये जा सकते है । प्रत्येक उद्देश्य की देश, काल, समाज और राष्ट्र के अनुसार व्याख्या होता है जिस प्रकार जीवन के उद्देश्यों को किसी सीमा से बांधा नहीं जा सकता उसी प्रकार शिक्षा के उद्देश्य भी सीमाओं से बंधे हुए नहीं होते । प्रत्येक समाज और राष्ट्र की अपनी विचारधारा शिक्षा के उद्देश्यों के रूप में स्वीकृत होती है।

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